
नई दिल्ली: भारत द्वारा आयोजित ‘AI Impact Summit’ में वैश्विक नेताओं और तकनीकी दिग्गजों का जमावड़ा लगा। इस दौरान फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने भारत के डिजिटल परिवर्तन की न केवल सराहना की, बल्कि इसे एक “सभ्यता की कहानी” करार दिया। उनके संबोधन में भारत के ‘स्ट्रीट वेंडर’ से लेकर ‘दुनिया के टॉप सीईओ’ तक का सफर छाया रहा।
“नमस्ते” से “जय हो” तक: मैक्रों का मुरीद अंदाज़
राष्ट्रपति मैक्रों ने अपने संबोधन की शुरुआत पारंपरिक ‘नमस्ते’ से की। उन्होंने भारत के डिजिटल बदलाव का उदाहरण देते हुए कहा कि 10 साल पहले मुंबई का एक रेहड़ी-पटरी वाला (स्ट्रीट वेंडर) बैंक खाता खोलने का सपना भी नहीं देख सकता था। आज वही व्यक्ति बिना किसी जटिल दस्तावेज़ के अपने फोन पर सेकंडों में डिजिटल भुगतान ले रहा है। यह केवल तकनीक नहीं, एक सामाजिक क्रांति है।
भारत के डिजिटल मॉडल के चार स्तंभ
मैक्रों ने विश्लेषण करते हुए बताया कि भारत का एआई और डिजिटल मॉडल दुनिया में सबसे अलग क्यों है। उन्होंने इसके चार मुख्य स्तंभ बताएः
डिजिटल इंडिया और UPI जैसा ठोस नेटवर्क ( बुनियादी ढांचा ), दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा डेवलपर समुदाय ( प्रतिभा ), एआई और स्टार्टअप्स में बढ़ता निवेश ( पूंजी ), भारत में नई तकनीक को अपनाने की गति दुनिया में सबसे तेज़ है (स्वीकार्यता), ‘इंडियन सीईओ’ का वैश्विक दबदबा।
मैक्रों ने इस बात पर विशेष ज़ोर दिया कि दुनिया की दिशा तय करने वाली कंपनियों की कमान अब भारतीयों के हाथ में है। उन्होंने कहा कि गूगल (सुंदर पिचाई) और माइक्रोसॉफ्ट (सत्या नडेला) जैसी दिग्गज कंपनियों से लेकर फ्रांस की सबसे बड़ी लग्जरी और रिटेल जगत से जुड़ी कंपनियों तक में भारतीय मूल का नेतृत्व भारत की मजबूती को दर्शाता है।
(नोट: फ्रांस की दिग्गज कंपनी ‘Chanel’ की ग्लोबल सीईओ लीना नायर भारतीय मूल की ही हैं, जिनका संदर्भ मैक्रों ने दिया।)
AI की वैश्विक रेस और भारत की स्थिति
मैक्रों ने स्वीकार किया कि एआई के क्षेत्र में अमेरिका और चीन के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा है, लेकिन यूरोप और भारत भी इस दौड़ में पीछे नहीं हैं। उन्होंने फ्रांस की एआई कंपनी Mistral का उदाहरण दिया, जिसने मात्र 2 साल में 12 अरब यूरो का मूल्यांकन हासिल किया।
उन्होंने भारत के आंकड़ों की प्रशंसा करते हुए कहा कि 1.4 अरब डिजिटल आईडी और 20 अरब मासिक UPI ट्रांजेक्शन जैसे आंकड़े किसी भी विकसित देश के लिए एक सपना हैं।
राष्ट्रपति मैक्रों ने अपने भाषण का अंत ‘जय हो’ के नारे के साथ किया, जो भारत के बढ़ते आत्मविश्वास और वैश्विक नेतृत्व का प्रतीक बन गया।






